बिलासपुर :- लगातार हो रही फजीहत और वन्य व पशु-पक्षी प्रेमियों के दबाव के बाद वन विभाग ने जिस कार्रवाई को अंजाम दिया है, उसे ज़मीनी सुधार से ज़्यादा खानापूर्ति और वाहवाही बटोरने की कोशिश माना जा रहा है। कोर जोन अधिकारी संजय लूथर द्वारा जारी विज्ञप्ति ने कार्रवाई का दावा तो किया, लेकिन इसके समय और नीयत पर सवाल खड़े हो गए हैं।

बताया जा रहा है कि यह पूरा मामला बीते वर्ष 27 दिसंबर का है, लेकिन लंबे समय तक विभाग मौन रहा। चूंकि मामला राजनीति से जुड़ा था, इसलिए अचानकमार के डीएफओ यू.आर. गणेश न तो कार्रवाई कर पाए और न ही मामले की जानकारी सार्वजनिक करने का साहस दिखा सके।सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि विभाग ने चतुराई दिखाते हुए एक आरोपी का नाम ही सूची से हटा दिया।

जबकि जमीनी हकीकत में चार आरोपी बताए जा रहे हैं, विभागीय दस्तावेजों और विज्ञप्ति में अब भी केवल तीन नाम ही दर्शाए जा रहे हैं।इस पूरे घटनाक्रम ने वन विभाग की मंशा, पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।सवाल यह है कि क्या यह कार्रवाई सच में अपराध के खिलाफ है या फिर दबाव में की गई एक औपचारिक रस्म? अब निगाहें इस पर हैं कि क्या शेष आरोपी पर भी निष्पक्ष कार्रवाई होगी या मामला फाइलों में ही दफन कर दिया जाएगा।
