बिलासपुर :- लोकगीतों की मधुर गूंज “काँच ही बँस के बहँगिया, बहँगी लचकल जाए…” के साथ जब अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया गया, तो मरीमाई घाट पर आस्था जैसे जीवंत हो उठी। महिलाओं की सजी थालियां, पुरुषों के कंधों पर दउरा, बच्चों के हाथों में दीप और घाट पर झिलमिलाती लहरें — यह नज़ारा सिर्फ पूजा नहीं, बल्कि भावनाओं की पराकाष्ठा थी। रविवार की शाम पूरा बिलासपुर छठी मईया की भक्ति में डूब गया।

घाटों तक पहुंचने के लिए दोपहर से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगी थी। कोई गीत गाते हुए चला आ रहा था, तो कोई “छठी मईया” का जयघोष करता हुआ। गन्ने के मंडपों से सजे घाटों पर व्रतियों ने दूध और जल से सूर्य को अर्घ्य दिया, मानो हर बूंद में भक्ति घुली हो। जैसे ही सूर्य की लालिमा जल में समाई, पूरा वातावरण भाव-विभोर हो उठा।

पूर्व विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने कहा, “छठ महापर्व हमें यह संदेश देता है कि जैसे हर अस्त के बाद नया उदय होता है, वैसे ही हर कठिनाई के बाद नया सवेरा आता है।वहीं महापौर पूजा विधानी ने कहा, “छठ हमें सिखाता है कि जीवन में हर कठिनाई के बावजूद हमें सूर्य की तरह उजाला फैलाना चाहिए। यह पर्व आत्मशुद्धि और प्रकृति के प्रति आभार का प्रतीक है।
मरीमाई मंदिर समिति अध्यक्ष डॉ. राजकुमार खेत्रपाल ने बताया कि चौदह वर्ष पहले जब घाट का स्वरूप जर्जर था, तब रवि पासवान और उनकी टीम ने पहल की। आज वही प्रयास शहर के सबसे भव्य आयोजन में बदल चुका है। उन्होंने रेलवे प्रशासन का आभार जताया जिसने घाट के सौंदर्यीकरण में सहयोग दिया।

तिफरा ब्लॉक अध्यक्ष लक्ष्मीनाथ साहू ने कहा, “सुख, संतान और समृद्धि की कामना से रखा गया यह व्रत छत्तीसगढ़ की मिट्टी में अब नई पहचान बन चुका है। सिरगिट्टी और मरीमाई घाट अब श्रद्धा के प्रतीक हैं।”
शाम ढलते ही घाट दीपों की पंक्तियों से जगमगा उठा। हवा में अगरबत्ती की खुशबू थी और कानों में “जय छठी मईया” की गूंज। भक्त आरती में झूमते, नाचते, भावनाओं में डूबे हुए नजर आए। हर कोई मानो कह रहा था सूर्य नमन से जीवन धन्य।

महाआरती के बाद अतिथियों ने माता त्रिपुर सुंदरी मरीमाई मंदिर में मत्था टेका और नगरवासियों की सुख-शांति की प्रार्थना की। इस अवसर पर धरमलाल कौशिक, महापौर पूजा विधानी, डॉ. खेत्रपाल, लक्ष्मीनाथ साहू, मनोज दुबे, बलराम देवांगन, हनीप खान सहित सैकड़ों श्रद्धालु उपस्थित रहे।

आयोजन समिति के रवि पासवान, केशव झा, तरुण अचारी, सोमनाथ पांडे, पुष्पेंद्र साहू, संजय यादव, गिरीश साहू और अन्य सदस्यों के अथक प्रयास से यह आयोजन आस्था का उत्सव बन गया।
